लौट के आऊँ मैं तो किसके लिये

लौट के आऊँ मैं तो किसके लिये

दिल ये जलाऊँ मैं तो किसके लिये
मरहम लगाऊँ मैं तो किसके लिये
धागे खुले मेरे दिल के सारे
ये दिल सिलवाऊँ मैं तो किसके लिये

सपने सजाऊँ मैं तो किसके लिये
घर बनाऊँ मैं तो किसके लिये
तेरी यादों का ही है बसेरा इस शहर में
इस शहर में आऊँ मैं तो किसके लिये

गीत गुनगुनाऊँ मैं तो किसके लिये
बातें बनाऊँ मैं तो किसके लिये
गहरा डूबा था मैं तेरे इश्क़ के समंदर मे
अब किनारे पे आऊँ मैं तो किसके लिये

आँसू बहाऊँ मैं तो किसके लिये
दर्द छुपाऊँ मैं तो किसके लिये
रह गए अधूरे दिलों के रिश्ते
लौट के आऊँ मैं तो किसके लिये

हाँ हम मजदूर हैं

हाँ हम मजदूर हैं

हाँ हम मजदूर हैं
हम अपने गाँवों से दूर हैं
भूख की आग ने कहाँ लेके फेंका
ख़ुदख़ुशी को मजबूर हैं

हाँ हम मजदूर हैं
शिक्षा से सुदूर हैं
परमात्मा ने क्यूँ ये खेल खेला
इँसानियत के हक़ से भी महरूम हैं

हाँ हम मजदूर हैं
बेबसी का गुरुर हैं
गरीबी का अभिशाप लिए हम
पूँजीपतियों के पैरों की धूल हैं

हाँ हम मजदूर हैं
बुनियादी जरुरतों से दूर हैं
खून पसीना से सींचा हमने भी देश को
फिर देश क्यूँ इतना क्रूर है

हाँ हम मजदूर हैं
हाँ हम मजबूर हैं
हाँ हम मजदूर हैं
हाँ कहाँ संघर्ष से दूर हैं ?

ज़िंदगी से एक प्रश्न?

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ऐ ज़िंदगी
समय की तरह बहूँ क्या तुझमें
हौसलों की तरह उडूँ क्या तुझमें
परिस्थितियों की तरह झुकूँ क्या तुझमें
स्वप्नों की तरह रुकूँ क्या तुझमें

ऐ ज़िंदगी
आँसुओं की तरह टपकूँ क्या तुझमें
नींदों की तरह भटकूँ क्या तुझमें
उल्फ़त की तरह तरसूँ क्या तुझमें
आशिक़ की तरह तड़पूँ क्या तुझमें

ऐ ज़िंदगी
शराबी की तरह बहकूँ क्या तुझमें
खुशियों की तरह चहकूँ क्या तुझमें
गजलों की तरह छलकूँ क्या तुझमें
गीतों की तरह महकूँ क्या तुझमें

ऐ ज़िंदगी
आदत की तरह ढलकूँ क्या तुझमें
फ़ितरत की तरह चलूँ क्या तुझमें
दौलत की तरह चमकूँ क्या तुझमें
सोहरत की तरह धमकूँ क्या तुझमें

ऐ ज़िंदगी
अंगारों की तरह जलूँ क्या तुझमें
सूरज की तरह तपूँ क्या तुझमें
लहरों की तरह उठूँ क्या तुझमें
रास्तों की तरह मिलूँ क्या तुझमें

पतझड़

पतझड़
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क्या तेरा दिल न रोया होगा
जब तुमने मुझको खोया होगा
अहसासों ने क्या बोला होगा
जब तुमने हमको तौला होगा

प्यार वफ़ा सब बातें रह गयी
जब तुमने ये उलझन खोला होगा
आँसू झर-झर गिरते होंगे
आँखों ने जब रोया होगा

टीस तुम्हें भी उठी होगी
याद तुम्हें भी आती होगी
मन बैरी-सा होता होगा
जब तुमने मुझको छोड़ा होगा

धरती रूकती होगी शायद
सूना जीवन का हर कोना होगा
दर्द ने तुमको तोड़ा होगा
तब तुमने मुझको छोड़ा होगा

ये समय 

ये समय 
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ये समय
आत्मा के अज़ान का है
भूखों के सम्मान का है
एकता के विधान का है
परीक्षा और परिणाम का है

ये समय
करुणा के दान का है
सब्र के इम्तिहान का है
स्वावलम्ब के निर्माण का है
ख़ुद के पहचान का है

ये समय
रिश्तों में मुस्कान का है
हर नए पकवान का है
आत्मबोध के ज्ञान का है
चिकित्सकों पे अभिमान का है

ये समय
किताबों के ज्ञान का है
योग और ध्यान का है
प्रार्थना और भगवान का है
अल्लाह और राम का है

समस्या है समाधान ढूँढो

समस्या है समाधान ढूँढो
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समस्या है समाधान ढूँढो
अपने जीवन में अभिमान ढूँढो
हर कदम पे है यहाँ कठिनाइयाँ
अपने कठिनाइयों में अपना स्वाभिमान ढूँढो
समस्या है समाधान ढूँढो

गरीबों के दुःख में भगवान ढूँढो
मुहब्बत भरे दिल में अज़ान ढूँढो
मज़हब बहुत हैं इस दुनिया में
हर मज़हब में इंसान ढूँढो
समस्या है समाधान ढूँढो

ये देश बिखर रहा है
एकता की पहचान ढूँढो
हर तरफ नफ़रत है फैली हुई
कहीं तो मुहब्बत का पैगाम ढूँढो
समस्या है समाधान ढूँढो

ज़िन्दगी रुकी सी है
दुनिया थमी सी है
उदासी और बेबसी फैली है यहाँ
कोई तो मुस्कुराहट का सामान ढूँढो
समस्या है समाधान ढूँढो
समस्या है समाधान ढूँढो

किंकर्त्तव्यविमूढ़ क्यूँ हो तुम

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किंकर्त्तव्यविमूढ़ क्यूँ हो तुम
क्या समय अब रूठ गया
क्या भाग्य अब फूट गया
क्या संसार अब छूट गया
क्या दिल अब टूट गया

किंकर्त्तव्यविमूढ़ क्यूँ हो तुम
क्या व्याकुल मन है
क्या व्याकुल तन है
क्या व्याकुल धन है
क्या व्याकुल ये जीवन है

किंकर्त्तव्यविमूढ़ क्यूँ हो तुम
क्या जीवन ने फिर तुमको ठगा
क्या अपनों ने फिर तुमको लुटा
क्या साहस हारा, धैर्य हारा और हारा तुम्हारा परिश्रम भी

किंकर्त्तव्यविमूढ़ क्यूँ हो तुम
क्या कुछ अपनों ने दुनियाँ छोड़ी या
क्या कुछ अपनों ने तुमको दुनियाँ में छोड़ा
क्या कुछ सपने परिस्थितियों की सूली चढ़ गये
क्या कुछ सपनें समय के भेंट चढ़ गये

किंकर्त्तव्यविमूढ़ क्यूँ हो तुम
आशा और निराशा पर्याय हैं यहाँ
जीवन और मरण अटल है यहाँ
सुख और दुःख सबको जीना है
आँसू और ग़म सबको पीना है

किंकर्त्तव्यविमूढ़ क्यूँ हो तुम
मुट्ठी बाँधे आये थे
और हाथ पसारे जाओगे
फिर क्यूँ इतना दुःख, क्यूँ इतना संघर्ष है करना
उम्मीद रखो, विश्वास रखो,
परमात्मा पर आस रखो
कुछ नहीं तो सिर्फ ख़ुद पे विश्वास रखो

अपनी परछाइयाँ ढूंढने चला हूँ मैं

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अपनी परछाइयाँ ढूंढने चला हूँ मैं
कोई बतलायेगा कि कहाँ जाना है मुझे
सरसों के खेतों में या
रेगिस्तान के रेतों में
बचपन के खेलों में या
छुक-छुक करती रेलों में
कोयल के गानों में या
पतंग के इठलाने में

अपनी परछाइयाँ ढूंढने चला हूँ मैं
कोई बतलायेगा कि कहाँ जाना है मुझे
माँ के प्यार में या
पापा के दुलार में
बहनों के पुचकार में या
भाइयों के ललकार में

अपनी परछाइयाँ ढूंढने चला हूँ मैं
कोई बतलायेगा कि कहाँ जाना है मुझे
उमंग में, हुड़दंग में या
जीवन के रंग में
शोर में, जोर में
या प्यार की डोर में

अपनी परछाइयाँ ढूंढने चला हूँ मैं
कोई बतलायेगा कि कहाँ जाना है मुझे
समय में, सम्वेदना में या
हृदय की चेतना में
संघर्ष में, जुनूनों में
या हौसलों की उड़ान में

अपनी परछाइयांँ ढूंढने चला हूँ मैं
कोई बतलायेगा कि कहाँ जाना है मुझे
गीता में, क़ुरान में या
बाईबल के ज्ञान में
अज़ान में, ध्यान में
या बचपन की मुस्कान में

एक द्वंद्व है

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एक द्वंद्व है
मन के अन्दर
और मन के बाहर

एक द्वंद्व है
सपनों में
और धरातल में

एक द्वंद्व है
अपनों में
और परायों में

एक द्वंद्व है
अमीरी में
और गरीबी में

एक द्वंद्व है
शिक्षित में
और अशिक्षित में

एक द्वंद्व है
आशा में
और निराशा में

एक द्वंद्व है
जीत में
और हार में

एक द्वंद्व है
जीवन में
और मरण में

एक द्वंद्व है
सच में
और झूठ में

एक द्वंद्व है
रोने में
और हॅंसने में

एक द्वंद्व है
अहिंसा में
और हिंसा में

एक द्वंद्व है
इन्सान में
और भगवान में

एक द्वंद्व है
मुझ में
और तुम में

एक द्वंद्व है
हमसब में
ये द्वंद्व ही जीवन है

ज़िंदगी तेरी फ़ितरत क्या है

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ज़िंदगी तेरी फ़ितरत क्या है
कभी तो मासूम थी
कभी मनचली भी
क्या हुआ तुझे
क्यूं मुँह मोड़ा तुने
क्या ग़लती हुई मुझसे
जरा बता मुझे

ज़िन्दगी तेरी फ़ितरत क्या है
कभी मेहरबान थी
अब क्यूँ है ख़फा
शोर भी अब सन्नाटा है
हौसलों में अब खामोशी है
मुस्कराहटें भी अब झूठी है
क्या ग़लती हुई मुझसे
जरा बता मुझे

ज़िन्दगी तेरी फ़ितरत क्या है
अपने पराये हो गये
इश्क़ मुकामिल न रहा
सारे सही ग़लत हो गये
और ग़लत सारे सही
अब धुंध है सन्नाटा है और सिर्फ है मायूसी
क्या ग़लती हुई मुझसे
जरा बता मुझे

ज़िन्दगी तेरी फ़ितरत क्या है
अब खुद को ढूंढ रहा हूँ
कभी अंदर कभी बाहर
कभी ध्यान में कभी भगवान में
कभी मंजिलों में कभी रास्तों मे
कुछ तो रहम कर
क्या ग़लती हुई मुझसे
जरा बता मुझे