समस्या है समाधान ढूँढो

समस्या है समाधान ढूँढो
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समस्या है समाधान ढूँढो
अपने जीवन में अभिमान ढूँढो
हर कदम पे है यहाँ कठिनाइयाँ
अपने कठिनाइयों में अपना स्वाभिमान ढूँढो
समस्या है समाधान ढूँढो

गरीबों के दुःख में भगवान ढूँढो
मुहब्बत भरे दिल में अज़ान ढूँढो
मज़हब बहुत हैं इस दुनिया में
हर मज़हब में इंसान ढूँढो
समस्या है समाधान ढूँढो

ये देश बिखर रहा है
एकता की पहचान ढूँढो
हर तरफ नफ़रत है फैली हुई
कहीं तो मुहब्बत का पैगाम ढूँढो
समस्या है समाधान ढूँढो

ज़िन्दगी रुकी सी है
दुनिया थमी सी है
उदासी और बेबसी फैली है यहाँ
कोई तो मुस्कुराहट का सामान ढूँढो
समस्या है समाधान ढूँढो
समस्या है समाधान ढूँढो

आज भी क्यूँ याद आ रहे हो तुम

आज भी क्यूँ याद आ रहे हो तुम
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आज भी क्यूँ याद आ रहे हो तुम
लग रहा है मुझमें मुस्कुरा रहे हो तुम
गम-ए-ज़िन्दगी फिर से हमें मज़बूर न कर
क्यूँ उनका आइना दिखा रहे हो तुम

सुलगा के मुझे मुझमें ही
क्यूँ चिराग जला रहे हो तुम
ऐ दिल-ए-नादाँ मुझको मज़बूर न कर
क्यूँ इन आँसुओं के तेज़ाब से जला रहे हो तुम

तेरी वफायें याद हैं मुझे
क्यूँ मुझको बेवफ़ा बना रहे हो तुम
दिल-ए-दरिया में बहुत तूफान हैं अभी
क्यूँ मेरे रूह को दफ़ना रहे हो तुम

कभी ना थी मुकम्मल ज़िन्दगी पहले से ही
इश्क़ के टीस से क्यूँ तड़पा रहे हो तुम
ले जानी है तो मेरी ज़िदगी ले जा
क्यूँ इन सिसकियों से मुझे रुला रहे हो तुम

आज भी क्यूँ याद आ रहे हो तुम
आज भी क्यूँ याद आ रहे हो तुम

फिर क्यूँ याद आते हो तुम

फिर क्यूँ याद आते हो तुम

फिर क्यूँ याद आते हो तुम…
रातों के अँधेरे में…
अकेले में…
या मेले में…
शोर में …
या सन्नाटे मे
फिर क्यूँ याद आते हो तुम …
फिर क्यूँ याद आते हो तुम …

जब तुमने कह दिया कि प्यार नहीं है…
और हमसे कोई करार नहीं है…
तो फ़िक्र की वज़ह क्या है
या बता दो मेरी ख़ता क्या है…
साँसें अब गिरती हैं, उठती हैं और संभलती है
आँखें सिसकती हैं, तरसती हैं और बरसती हैं…
दिन का चैन नहीं ,और रात का करार नहीं
सब कुछ धुँधला सा और बुझा हुआ है
न चिराग है ,ना रौशनी है ,ना धुप है और नहीं उजाला है
अब तो सिर्फ दर्द है, दुःख है, ख़ामोशी है ,और सन्नाटा है
तुमको मुझपे ऐतबार नहीं
फिर क्यूँ याद आते हो तुम…
फिर क्यूँ याद आते हो तुम …

दिल की धड़कनों का शोर…
और दिमाग की नसों का जोर…
जब उलझाती हैं मुझे…
बन्द आँखों में भी आके तुम जब ललचाती है मुझे…
जब बँद होठों से मन पुकारता है तुझे…
दोनो हाथों को जोड़ के आत्मा स्वीकारता है तुझे…
फिर क्यूँ अहसास हुआ है गुम…
फिर क्यूँ याद आते हो तुम…
फिर क्यूँ याद आते हो तुम …

कब न कश्ती है न मुसाफिर है न ही किनारा है…
अब न महफ़िल है न शाम है न ही कोई इशारा है…
अब न वो ज़ाम है न ही वो मुस्कराहट है न वो जुल्फों की सरसराहट है…
पर फिर भी, फिर सिर्फ तुम
सिर्फ याद आते हो तुम…

बरसात और तुम

बरसात और तुम

एक रोज अचानक से मेरी ज़िन्दगी में आये तुम बिल्कुल बरसात की तरह
हँसते हुए ,मुस्कुराते हुए ,खिलखिलाते हुए,मचलते हुए,सँवरते हुए
ऐसा जिसे न कोई रोक सके ,ना ही कोई टोक सके
अपने ही उमंगों में मदमस्त ,बेख़बर,आह्लाद सी
जो जिंदगी को भी जीने का ढंग सीखा दे,
उन ओस की बूँदो की तरह जो सुबह की घासों पे,
पत्तों पे पड़ते ही उनको फिर से हरा कर दे ,
जिंदा कर दे…

एक रोज अचानक से मेरी ज़िन्दगी में आये तुम बिल्कुल बरसात की तरह…
एक रोज अचानक से मेरी ज़िन्दगी में आये तुम बिल्कुल बरसात की तरह
जो आकाश से बेपरवाह गिरी,अपने बूँदों की सहेलियों को ले के
नाचते हुए ,झूमते हुए ,कहकहे लगाते हुए
मिट्टी की प्यास बुझाने ,
ठीक उसी तरह जिस तरह तुम आयी थी मेरी ज़िन्दगी में,
और बदल दिया मुझे,
अब नयी ज़िन्दगी ,नई खुशियाँ ,नई तरंग और नया उमंग है,
तुमने आकर मन को छुआ, रूह को स्पर्श किया
कब दिल क्या ,धड़कन क्या,आत्मा भी तेरी नूर की उजली रौशनी में लिपट के जगमगा रही है,
जैसे पूरे जहाँ के फूल अपने रंगों को बिखेर रहे हैं,
अब तेरी मुस्कुराहट को देख के मुस्कुराता हुँ,हँसता हुँ ,गाता हुँ
अब नए आस ,नए सपने,नये जुनून हैं,
न कोई फ़िक्र है , न कोई घमण्ड है,
न जीतने का लालच ,न खोने का ग़म है
अब हर जगह सिर्फ तुम ही तुम है ,और तुम है…

एक रोज अचानक से मेरी ज़िन्दगी में आये तुम बिल्कुल बरसात की तरह
पर आज तू खुद बरसात में भींगी हुई थी,
बूँदों से लिपटी हुई थी,
थोड़ी गीली सी
अपनी घूंघराली लटों को सुलझाती और बिखराती हुई
मानो स्वर्ग का दरवाजा खुला और खुद शिव ने सीढ़ी बनाये
और तुम मेरे सामने आई,प्यार की घड़ियों में ले जाने को
तुम्हारे आने का सुख शायद अमृत को पाने के सुख से भी ज्यादा था
ऐसा लगा की ज़िन्दगी में अब कुछ नहीं चाहिए
राम रोम खिल उठे,धड़कने रागिनी गाने लगीं
ओर बरसात की बूँदें भी अपनी संगीत से ,
सुर से ,उस समय के लम्हे को सजाने लगीं…
मेरे आँखों के पलकों ने भी झुकने से बगावत कर दी
काश ये पल रुक जाए, काश तुम ठहर जाओ
काश थोड़ी ज़िन्दगी और जी लूँ
काश थोड़ी खुशी और पा लूँ
आज खु़दा से बस यही इबादत है
आज न बरसात जाये और न ही तुम…
एक रोज अचानक से मेरी ज़िन्दगी में आये तुम बिल्कुल बरसात की तरह…

समझ से परे है समझ तेरी !!

समझ से परे है समझ तेरी !!

समझ से परे है समझ तेरी
समझ से परे है समझ मेरी
मेरे लिए तू शांति
तेरे लिए मैं युद्ध
मेरे लिए तू कविता
तेरे लिए मैं निरर्थ
मेरे लिए तू भविष्य
तेरे लिए मैं बीता कल
मेरे लिए तू अभिमान
तेरे लिए मैं कायरता
मेरे लिए तू धूप
तेरे लिए मैं सर्द रात
मेरे लिए तू क़श्ती
तेरे लिए मैं समन्दर की तूफान
मेरे लिए तू हमसफर
तेरे लिए मैं साया
मेरे लिए तू मंज़िल
तेरे लिए मैं सिर्फ रास्ता
समझ से परे है समझ तेरी
समझ से परे है समझ मेरी

मेरे लिए तू सच
तेरे लिए मैं झूठ
मेरे लिए तू दवा
तेरे लिए मैं ज़हर
मेरे लिए तू ख़्वाब
तेरे लिए मैं हक़ीक़त
मेरे लिए तू रोशनी
तेरे लिए मैं अन्धेरा
मेरे लिए तू घमंड
तेरे लिए मैं शर्म
मेरे लिए तू सपना
तेरे लिए मैं सच
मेरे लिए तू आशीर्वाद
तेरे लिए मैं शाप…
समझ से परे है समझ तेरी
समझ से परे है समझ मेरी

मेरे लिए तू इबादत
तेरे लिए मैं गाली
मेरे लिए तू ज़िंदगी
तेरे लिए मैं मौत
मेरे लिए तू सज़दा
तेरे लिए मैं हराम
मेरे लिए तू दरिया
तेरे लिए मैं प्यास
मेरे लिए तू खुशी
तेरे लिए मैं दुःख
मेरे लिए तू दवा
तेरे लिए मैं रोग
मेरे लिए तू मोहब्बत
तेरे लिए मैं नफरत
समझ से परे है समझ तेरी
समझ से परे है समझ मेरी

मेरे लिए तू आकाश की ऊँचाई
तेरे लिए मैं पाताल की गहराई
मेरे लिए तू अलाव की गर्मी
तेरे लिए मैं सर्दी की कँपकपाहट
मेरे लिए तू रेगिस्तान का पानी
तेरे लिए मैं रेत का समन्दर
मेरे लिए तू सबसे समझदार
तेरे लिए मैं सबसे बड़ा पागल
मेरे लिए तू मेरी उम्मीद
तेरे लिए मैं सिर्फ निराशा
मेरे लिए तू जाड़े की सुनहरी धूप
तेरे लिए मैं गर्मी की बेचैनी
समझ से परे है समझ तेरी
समझ से परे है समझ मेरी

मेरे लिए तू तो सुबह का उजाला
तेरे लिए मैं शाम का अन्धेरा
मेरे लिए तू जीवन
तेरे लिए मैं मृत्यु…
मेरे लिए तू अर्थ
तेरे लिए मैं अनर्थ..
मेरे लिए तू प्रेम
तेरे लिए मैं जाति का बँधन
मेरे लिए तू अपनापन
तेरे लिए मैं धर्म का ओछापन
मेरे लिए तू सुंदरता की मूरत
तेरे लिए मैं भाषा की घृणा
समझ से परे है समझ तेरी
समझ से परे है समझ मेरी

अब जरूरत नहीं है…

अब जरूरत नहीं है…

अब जरूरत नहीं है…
तेरी हर बातों की और मेरी हर मुलाक़ातों की
तेरे हर चहकने की और मेरे हर बहकने की
अब जरूरत नहीं है…

तेरे हर ज़िक्र की और मेरे हर फ़िक्र की
तेरे हर ख़्याल की और मेरे हर सवाल की
अब जरूरत नहीं है…

तेरे हर अर्ज़ की और मेरे हर फ़र्ज़ की
तेरे हर दीदार की और मेरे हर इंतज़ार की
अब जरूरत नहीं है…

तेरे हर मुस्कान की और मेरे हर अरमान की
तेरे हर यकीन की और मेरे हर वजह की
अब जरूरत नहीं है…

तेरे हर दवा की और मेरे हर दर्द की
तेरे हर शिक़वे की और मेरे हर शिकायत की
अब जरूरत नहीं है…

तेरे हर ख़ामोशियों की और मेरे हर लड़ाइयों की
तेरे हर रूठने की और मेरे हर मनाने की
अब जरूरत नहीं है…

तेरे हर हक़ीकत की और मेरे हर ख़्वाब की
तेरे हर उलझनों की और मेरे हर जवाब की
अब जरूरत नहीं है…

तेरे हर नज़रअंदाज़ की और मेरे हर ध्यान की
तेरे हर मौन की और मेरे अंदर उठी हर तूफ़ान की
अब जरूरत नहीं है…

अब सच कहूँ तो,
तेरे आने की और अब जाने की
तेरे हर इक़रार की, इज़हार की और इंकार की
और तेरे हर प्यार की
अब जरूरत नहीं है…

किंकर्त्तव्यविमूढ़ क्यूँ हो तुम

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किंकर्त्तव्यविमूढ़ क्यूँ हो तुम
क्या समय अब रूठ गया
क्या भाग्य अब फूट गया
क्या संसार अब छूट गया
क्या दिल अब टूट गया

किंकर्त्तव्यविमूढ़ क्यूँ हो तुम
क्या व्याकुल मन है
क्या व्याकुल तन है
क्या व्याकुल धन है
क्या व्याकुल ये जीवन है

किंकर्त्तव्यविमूढ़ क्यूँ हो तुम
क्या जीवन ने फिर तुमको ठगा
क्या अपनों ने फिर तुमको लुटा
क्या साहस हारा, धैर्य हारा और हारा तुम्हारा परिश्रम भी

किंकर्त्तव्यविमूढ़ क्यूँ हो तुम
क्या कुछ अपनों ने दुनियाँ छोड़ी या
क्या कुछ अपनों ने तुमको दुनियाँ में छोड़ा
क्या कुछ सपने परिस्थितियों की सूली चढ़ गये
क्या कुछ सपनें समय के भेंट चढ़ गये

किंकर्त्तव्यविमूढ़ क्यूँ हो तुम
आशा और निराशा पर्याय हैं यहाँ
जीवन और मरण अटल है यहाँ
सुख और दुःख सबको जीना है
आँसू और ग़म सबको पीना है

किंकर्त्तव्यविमूढ़ क्यूँ हो तुम
मुट्ठी बाँधे आये थे
और हाथ पसारे जाओगे
फिर क्यूँ इतना दुःख, क्यूँ इतना संघर्ष है करना
उम्मीद रखो, विश्वास रखो,
परमात्मा पर आस रखो
कुछ नहीं तो सिर्फ ख़ुद पे विश्वास रखो