मुझे भी गाँव जाना है

मुझे भी गाँव जाना है
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मुझे भी गाँव जाना है
खेतों में चिड़ियों के संग चहचाना है
अपने बैलों के साथ सर हिलाना है
पोखर में खुब नहाना है
पुआल का बिछौना बनाना है

मुझे भी गाँव जाना है
माँ के गोद में सो जाना है
पापा का आशीर्वाद पाना है
दादाजी के पाँव दबाना है
नानी को खुब घूमाना है

मुझे भी गाँव जाना है
रात में वीसीआर किराया पे लेना 
एक रात में ३ फिल्में निपटाना है
टीवी का एन्टीना हिलाना है
रेडियो के गाने गा गा के सुनना है

मुझे भी गाँव जाना है
संध्या में दीपक जलाना है
घर का आटा पिसवाना है
जोरन से दही जमाना है
बाजार से सब्जी लाना है

मुझे भी गाँव जाना है
साइकिल का पंचर बनवाना है
टूटा चप्पल सिलवाना है
नुक्कड़ पे पान चबाना है
दोस्तों संग खुब बतियाना है

मुझे भी गाँव जाना है
गली में इश्क़ लड़ाना  है
उसके भाई से ख़त पहुँचवाना है
उसके मुस्कराहट पे मुस्कुराना है
मुझे तो मजनू बन जाना है

मुझे भी गाँव जाना है
शादियों में रसगुल्ला उड़ाना है
होली में रंग लगाना है
नए कपडे़ सिलवाना है
त्यौहारों को खुब मनाना है

मुझे भी गाँव जाना है
आँगन में सो जाना है
अपनों का प्यार पाना है
खुब हँसी लुटाना है
ज़िन्दगी जी जाना है

मुझे भी गाँव जाना है
मुझे भी गाँव जाना है

लौट के आऊँ मैं तो किसके लिये

लौट के आऊँ मैं तो किसके लिये

दिल ये जलाऊँ मैं तो किसके लिये
मरहम लगाऊँ मैं तो किसके लिये
धागे खुले मेरे दिल के सारे
ये दिल सिलवाऊँ मैं तो किसके लिये

सपने सजाऊँ मैं तो किसके लिये
घर बनाऊँ मैं तो किसके लिये
तेरी यादों का ही है बसेरा इस शहर में
इस शहर में आऊँ मैं तो किसके लिये

गीत गुनगुनाऊँ मैं तो किसके लिये
बातें बनाऊँ मैं तो किसके लिये
गहरा डूबा था मैं तेरे इश्क़ के समंदर मे
अब किनारे पे आऊँ मैं तो किसके लिये

आँसू बहाऊँ मैं तो किसके लिये
दर्द छुपाऊँ मैं तो किसके लिये
रह गए अधूरे दिलों के रिश्ते
लौट के आऊँ मैं तो किसके लिये

हाँ हम मजदूर हैं

हाँ हम मजदूर हैं

हाँ हम मजदूर हैं
हम अपने गाँवों से दूर हैं
भूख की आग ने कहाँ लेके फेंका
ख़ुदख़ुशी को मजबूर हैं

हाँ हम मजदूर हैं
शिक्षा से सुदूर हैं
परमात्मा ने क्यूँ ये खेल खेला
इँसानियत के हक़ से भी महरूम हैं

हाँ हम मजदूर हैं
बेबसी का गुरुर हैं
गरीबी का अभिशाप लिए हम
पूँजीपतियों के पैरों की धूल हैं

हाँ हम मजदूर हैं
बुनियादी जरुरतों से दूर हैं
खून पसीना से सींचा हमने भी देश को
फिर देश क्यूँ इतना क्रूर है

हाँ हम मजदूर हैं
हाँ हम मजबूर हैं
हाँ हम मजदूर हैं
हाँ कहाँ संघर्ष से दूर हैं ?

और चल दिये

और चल दिये
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ज़िन्दगी में आए, उम्मीदें जगाये
खुब मुस्कुराये, कहकहे लगाये
दीया बने, खुब जगमगाये
हर दीया बुझाया ,और चल दिये

वक़्त ने किया मुकम्मल कोशिशें
वक़्त में गिरे, ठहरे और उठे
वक़्त को ज़िया, वक़्त को पिया
वक़्त को वक़्त का मरहम लगाये, और चल दिये

यादों की कविताएं बनाये
बातों की कहानियाँ लिखें
समय के घोंसले में अपना संसार सजाया
ज़िन्दगी को गीत सा गुनगुनाया ,और चल दिये

ज़िन्दगी के आग को ज़िन्दगी में जलाया
हर लौ में ख़ुद को तपाया
कोशिशों की आग में खुद को सुलगाया
हर वो आग बुझाए ,और चल दिये

कई बार ज़िन्दगी के राहों में ख़ामोशी खड़ी थी
ख़ामोशी को रिश्तों की आवाज़ सुनाया
हर किसी को अपनाया, समझाया, सुलझाया
हर उस बोझ का बस्ता उठाया ,और चल दिये

ज़िंदगी से एक प्रश्न?

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ऐ ज़िंदगी
समय की तरह बहूँ क्या तुझमें
हौसलों की तरह उडूँ क्या तुझमें
परिस्थितियों की तरह झुकूँ क्या तुझमें
स्वप्नों की तरह रुकूँ क्या तुझमें

ऐ ज़िंदगी
आँसुओं की तरह टपकूँ क्या तुझमें
नींदों की तरह भटकूँ क्या तुझमें
उल्फ़त की तरह तरसूँ क्या तुझमें
आशिक़ की तरह तड़पूँ क्या तुझमें

ऐ ज़िंदगी
शराबी की तरह बहकूँ क्या तुझमें
खुशियों की तरह चहकूँ क्या तुझमें
गजलों की तरह छलकूँ क्या तुझमें
गीतों की तरह महकूँ क्या तुझमें

ऐ ज़िंदगी
आदत की तरह ढलकूँ क्या तुझमें
फ़ितरत की तरह चलूँ क्या तुझमें
दौलत की तरह चमकूँ क्या तुझमें
सोहरत की तरह धमकूँ क्या तुझमें

ऐ ज़िंदगी
अंगारों की तरह जलूँ क्या तुझमें
सूरज की तरह तपूँ क्या तुझमें
लहरों की तरह उठूँ क्या तुझमें
रास्तों की तरह मिलूँ क्या तुझमें

पतझड़

पतझड़
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क्या तेरा दिल न रोया होगा
जब तुमने मुझको खोया होगा
अहसासों ने क्या बोला होगा
जब तुमने हमको तौला होगा

प्यार वफ़ा सब बातें रह गयी
जब तुमने ये उलझन खोला होगा
आँसू झर-झर गिरते होंगे
आँखों ने जब रोया होगा

टीस तुम्हें भी उठी होगी
याद तुम्हें भी आती होगी
मन बैरी-सा होता होगा
जब तुमने मुझको छोड़ा होगा

धरती रूकती होगी शायद
सूना जीवन का हर कोना होगा
दर्द ने तुमको तोड़ा होगा
तब तुमने मुझको छोड़ा होगा

ये समय 

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ये समय
आत्मा के अज़ान का है
भूखों के सम्मान का है
एकता के विधान का है
परीक्षा और परिणाम का है

ये समय
करुणा के दान का है
सब्र के इम्तिहान का है
स्वावलम्ब के निर्माण का है
ख़ुद के पहचान का है

ये समय
रिश्तों में मुस्कान का है
हर नए पकवान का है
आत्मबोध के ज्ञान का है
चिकित्सकों पे अभिमान का है

ये समय
किताबों के ज्ञान का है
योग और ध्यान का है
प्रार्थना और भगवान का है
अल्लाह और राम का है

समस्या है समाधान ढूँढो

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समस्या है समाधान ढूँढो
अपने जीवन में अभिमान ढूँढो
हर कदम पे है यहाँ कठिनाइयाँ
अपने कठिनाइयों में अपना स्वाभिमान ढूँढो
समस्या है समाधान ढूँढो

गरीबों के दुःख में भगवान ढूँढो
मुहब्बत भरे दिल में अज़ान ढूँढो
मज़हब बहुत हैं इस दुनिया में
हर मज़हब में इंसान ढूँढो
समस्या है समाधान ढूँढो

ये देश बिखर रहा है
एकता की पहचान ढूँढो
हर तरफ नफ़रत है फैली हुई
कहीं तो मुहब्बत का पैगाम ढूँढो
समस्या है समाधान ढूँढो

ज़िन्दगी रुकी सी है
दुनिया थमी सी है
उदासी और बेबसी फैली है यहाँ
कोई तो मुस्कुराहट का सामान ढूँढो
समस्या है समाधान ढूँढो
समस्या है समाधान ढूँढो

आज भी क्यूँ याद आ रहे हो तुम

आज भी क्यूँ याद आ रहे हो तुम
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आज भी क्यूँ याद आ रहे हो तुम
लग रहा है मुझमें मुस्कुरा रहे हो तुम
गम-ए-ज़िन्दगी फिर से हमें मज़बूर न कर
क्यूँ उनका आइना दिखा रहे हो तुम

सुलगा के मुझे मुझमें ही
क्यूँ चिराग जला रहे हो तुम
ऐ दिल-ए-नादाँ मुझको मज़बूर न कर
क्यूँ इन आँसुओं के तेज़ाब से जला रहे हो तुम

तेरी वफायें याद हैं मुझे
क्यूँ मुझको बेवफ़ा बना रहे हो तुम
दिल-ए-दरिया में बहुत तूफान हैं अभी
क्यूँ मेरे रूह को दफ़ना रहे हो तुम

कभी ना थी मुकम्मल ज़िन्दगी पहले से ही
इश्क़ के टीस से क्यूँ तड़पा रहे हो तुम
ले जानी है तो मेरी ज़िदगी ले जा
क्यूँ इन सिसकियों से मुझे रुला रहे हो तुम

आज भी क्यूँ याद आ रहे हो तुम
आज भी क्यूँ याद आ रहे हो तुम

फिर क्यूँ याद आते हो तुम

फिर क्यूँ याद आते हो तुम

फिर क्यूँ याद आते हो तुम…
रातों के अँधेरे में…
अकेले में…
या मेले में…
शोर में …
या सन्नाटे मे
फिर क्यूँ याद आते हो तुम …
फिर क्यूँ याद आते हो तुम …

जब तुमने कह दिया कि प्यार नहीं है…
और हमसे कोई करार नहीं है…
तो फ़िक्र की वज़ह क्या है
या बता दो मेरी ख़ता क्या है…
साँसें अब गिरती हैं, उठती हैं और संभलती है
आँखें सिसकती हैं, तरसती हैं और बरसती हैं…
दिन का चैन नहीं ,और रात का करार नहीं
सब कुछ धुँधला सा और बुझा हुआ है
न चिराग है ,ना रौशनी है ,ना धुप है और नहीं उजाला है
अब तो सिर्फ दर्द है, दुःख है, ख़ामोशी है ,और सन्नाटा है
तुमको मुझपे ऐतबार नहीं
फिर क्यूँ याद आते हो तुम…
फिर क्यूँ याद आते हो तुम …

दिल की धड़कनों का शोर…
और दिमाग की नसों का जोर…
जब उलझाती हैं मुझे…
बन्द आँखों में भी आके तुम जब ललचाती है मुझे…
जब बँद होठों से मन पुकारता है तुझे…
दोनो हाथों को जोड़ के आत्मा स्वीकारता है तुझे…
फिर क्यूँ अहसास हुआ है गुम…
फिर क्यूँ याद आते हो तुम…
फिर क्यूँ याद आते हो तुम …

कब न कश्ती है न मुसाफिर है न ही किनारा है…
अब न महफ़िल है न शाम है न ही कोई इशारा है…
अब न वो ज़ाम है न ही वो मुस्कराहट है न वो जुल्फों की सरसराहट है…
पर फिर भी, फिर सिर्फ तुम
सिर्फ याद आते हो तुम…