पतझड़

पतझड़
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क्या तेरा दिल न रोया होगा
जब तुमने मुझको खोया होगा
अहसासों ने क्या बोला होगा
जब तुमने हमको तौला होगा

प्यार वफ़ा सब बातें रह गयी
जब तुमने ये उलझन खोला होगा
आँसू झर-झर गिरते होंगे
आँखों ने जब रोया होगा

टीस तुम्हें भी उठी होगी
याद तुम्हें भी आती होगी
मन बैरी-सा होता होगा
जब तुमने मुझको छोड़ा होगा

धरती रूकती होगी शायद
सूना जीवन का हर कोना होगा
दर्द ने तुमको तोड़ा होगा
तब तुमने मुझको छोड़ा होगा

आज भी क्यूँ याद आ रहे हो तुम

आज भी क्यूँ याद आ रहे हो तुम
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आज भी क्यूँ याद आ रहे हो तुम
लग रहा है मुझमें मुस्कुरा रहे हो तुम
गम-ए-ज़िन्दगी फिर से हमें मज़बूर न कर
क्यूँ उनका आइना दिखा रहे हो तुम

सुलगा के मुझे मुझमें ही
क्यूँ चिराग जला रहे हो तुम
ऐ दिल-ए-नादाँ मुझको मज़बूर न कर
क्यूँ इन आँसुओं के तेज़ाब से जला रहे हो तुम

तेरी वफायें याद हैं मुझे
क्यूँ मुझको बेवफ़ा बना रहे हो तुम
दिल-ए-दरिया में बहुत तूफान हैं अभी
क्यूँ मेरे रूह को दफ़ना रहे हो तुम

कभी ना थी मुकम्मल ज़िन्दगी पहले से ही
इश्क़ के टीस से क्यूँ तड़पा रहे हो तुम
ले जानी है तो मेरी ज़िदगी ले जा
क्यूँ इन सिसकियों से मुझे रुला रहे हो तुम

आज भी क्यूँ याद आ रहे हो तुम
आज भी क्यूँ याद आ रहे हो तुम

फिर क्यूँ याद आते हो तुम

फिर क्यूँ याद आते हो तुम

फिर क्यूँ याद आते हो तुम…
रातों के अँधेरे में…
अकेले में…
या मेले में…
शोर में …
या सन्नाटे मे
फिर क्यूँ याद आते हो तुम …
फिर क्यूँ याद आते हो तुम …

जब तुमने कह दिया कि प्यार नहीं है…
और हमसे कोई करार नहीं है…
तो फ़िक्र की वज़ह क्या है
या बता दो मेरी ख़ता क्या है…
साँसें अब गिरती हैं, उठती हैं और संभलती है
आँखें सिसकती हैं, तरसती हैं और बरसती हैं…
दिन का चैन नहीं ,और रात का करार नहीं
सब कुछ धुँधला सा और बुझा हुआ है
न चिराग है ,ना रौशनी है ,ना धुप है और नहीं उजाला है
अब तो सिर्फ दर्द है, दुःख है, ख़ामोशी है ,और सन्नाटा है
तुमको मुझपे ऐतबार नहीं
फिर क्यूँ याद आते हो तुम…
फिर क्यूँ याद आते हो तुम …

दिल की धड़कनों का शोर…
और दिमाग की नसों का जोर…
जब उलझाती हैं मुझे…
बन्द आँखों में भी आके तुम जब ललचाती है मुझे…
जब बँद होठों से मन पुकारता है तुझे…
दोनो हाथों को जोड़ के आत्मा स्वीकारता है तुझे…
फिर क्यूँ अहसास हुआ है गुम…
फिर क्यूँ याद आते हो तुम…
फिर क्यूँ याद आते हो तुम …

कब न कश्ती है न मुसाफिर है न ही किनारा है…
अब न महफ़िल है न शाम है न ही कोई इशारा है…
अब न वो ज़ाम है न ही वो मुस्कराहट है न वो जुल्फों की सरसराहट है…
पर फिर भी, फिर सिर्फ तुम
सिर्फ याद आते हो तुम…

बरसात और तुम

बरसात और तुम

एक रोज अचानक से मेरी ज़िन्दगी में आये तुम बिल्कुल बरसात की तरह
हँसते हुए ,मुस्कुराते हुए ,खिलखिलाते हुए,मचलते हुए,सँवरते हुए
ऐसा जिसे न कोई रोक सके ,ना ही कोई टोक सके
अपने ही उमंगों में मदमस्त ,बेख़बर,आह्लाद सी
जो जिंदगी को भी जीने का ढंग सीखा दे,
उन ओस की बूँदो की तरह जो सुबह की घासों पे,
पत्तों पे पड़ते ही उनको फिर से हरा कर दे ,
जिंदा कर दे…

एक रोज अचानक से मेरी ज़िन्दगी में आये तुम बिल्कुल बरसात की तरह…
एक रोज अचानक से मेरी ज़िन्दगी में आये तुम बिल्कुल बरसात की तरह
जो आकाश से बेपरवाह गिरी,अपने बूँदों की सहेलियों को ले के
नाचते हुए ,झूमते हुए ,कहकहे लगाते हुए
मिट्टी की प्यास बुझाने ,
ठीक उसी तरह जिस तरह तुम आयी थी मेरी ज़िन्दगी में,
और बदल दिया मुझे,
अब नयी ज़िन्दगी ,नई खुशियाँ ,नई तरंग और नया उमंग है,
तुमने आकर मन को छुआ, रूह को स्पर्श किया
कब दिल क्या ,धड़कन क्या,आत्मा भी तेरी नूर की उजली रौशनी में लिपट के जगमगा रही है,
जैसे पूरे जहाँ के फूल अपने रंगों को बिखेर रहे हैं,
अब तेरी मुस्कुराहट को देख के मुस्कुराता हुँ,हँसता हुँ ,गाता हुँ
अब नए आस ,नए सपने,नये जुनून हैं,
न कोई फ़िक्र है , न कोई घमण्ड है,
न जीतने का लालच ,न खोने का ग़म है
अब हर जगह सिर्फ तुम ही तुम है ,और तुम है…

एक रोज अचानक से मेरी ज़िन्दगी में आये तुम बिल्कुल बरसात की तरह
पर आज तू खुद बरसात में भींगी हुई थी,
बूँदों से लिपटी हुई थी,
थोड़ी गीली सी
अपनी घूंघराली लटों को सुलझाती और बिखराती हुई
मानो स्वर्ग का दरवाजा खुला और खुद शिव ने सीढ़ी बनाये
और तुम मेरे सामने आई,प्यार की घड़ियों में ले जाने को
तुम्हारे आने का सुख शायद अमृत को पाने के सुख से भी ज्यादा था
ऐसा लगा की ज़िन्दगी में अब कुछ नहीं चाहिए
राम रोम खिल उठे,धड़कने रागिनी गाने लगीं
ओर बरसात की बूँदें भी अपनी संगीत से ,
सुर से ,उस समय के लम्हे को सजाने लगीं…
मेरे आँखों के पलकों ने भी झुकने से बगावत कर दी
काश ये पल रुक जाए, काश तुम ठहर जाओ
काश थोड़ी ज़िन्दगी और जी लूँ
काश थोड़ी खुशी और पा लूँ
आज खु़दा से बस यही इबादत है
आज न बरसात जाये और न ही तुम…
एक रोज अचानक से मेरी ज़िन्दगी में आये तुम बिल्कुल बरसात की तरह…